Skip to main content




अफ़ग़ानिस्तान शांति प्रक्रिया:  अपेक्षा और विकल्प


(my article in HIndi, to be published soon, sorry for the language but this is the best I could do!)


अफ़ग़ानिस्तान मे आतंकवाद के खिलाफ चल रहा युद्ध आब अंतिम चरण मे गया है और आनेवाले अधिकतम दो वर्षोमे इसका समाधान अपेक्षित है.अमरीकी युध ने एक और बार यह स्पष्ता किया है के कोई भी अफ़ग़ानिस्तान मे आकर लड़ सकता है लेकिन वहाँ जीतना लगभग नामुमकिन है. अमरीकाकी निष्कास कूटनीति इस एक कटु सत्य का विवरण है.

इतिहास बताता है कि अफ़ग़ानिस्तान का भौगोलिक स्थान उस देशकी राजनीतिक स्थिरता के लिए एक अभिशाप बन गया है और  आधुनिक आंतरराष्ट्रीय राजनीति के समय मे उसे यहा स्थिरता नहीं मिल पाई है. अब यहा सवाल सबसे बड़ा है के क्या अमरीकी निष्कास के बाद इस युद्धसे बेजार राष्ट्रको स्थिरता प्राप्त होगी या फिरसे अराजकता नियंत्रण लेगी? शान्ती प्रक्रियामे रूचि रखनेवालो के लिए आज अराजकता की आशंका एक गहरा संकट बनी है.

इस मोड़ पर दो सवालों पर विचार करना आवश्यक है: अराजकता क्यों वापस सकती है और उस संभावनासे बचने के लिए क्या किया जा सकता है?

अफगानिस्तान में शामिल शक्तियों मे शांति प्रक्रिया को आगे ले जाने पर सहमती नही है. जबके अमरीका अच्छे और बुरे तालिबान मे अंतर करके अच्छेतालिबान को शांति प्रक्रिया मे लाना चाहता है और जिसे वो बुरा तालिबान समज़ता है उस ग्रूप को अलग करके उसके खिलाफ सैनीकी तेज़ करना चाहता है.पाकिस्तान के मुताबिक ऐसी कोई नीति जो पाकिस्तानी तालिबान को मजबूत करे वो उसे मंजूर नही होगी. जिसका मतलब है कि पाकिस्तानी और अमेरिकीलक्ष्यों के बीच कोई विरोधाभास है जो अच्छा नही क्योंकि इन दो देशोकी भूमीका आफ्गानिस्तान के लिए सबसे महत्वपूर्ण है. इस युद्ध के अंतिम चरण मे अमरीका को पाकिस्तान के सहयोग की बहूत ज़रूरत है क्योंकि युद्ध को टलने के लिए तालिबानी आतंकी पाकिस्तान मे शरण ले सकते है और युद्ध विराम के बाद विघटनकारी रूप लेकर आफ्गानिस्तान मे लौट सकते है जिससे आफ्गानिस्तान के सरकार और जनता को धोका पैदा हो सकता है.दूसरी तरफ, यदि यह तत्व पाकिस्तान में रहते है तो वे पाकिस्तान सेना और रक्षा प्रतिष्ठान को चुनौती दे सकता. और तो और पाकिस्तान ये जानता है की अफ़ग़ानिस्तान शांति के बाद, अगर ये होता है तो, अमरिकसे उसे मिलने वाली आर्थिक और सामरिक सहायता बंद हो जाएगी और कमज़ोर लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था के कारण जल्द ही उसकी सेना तख्तापलट का विचार कर सकती है. इसी कारणवश पाकिस्तान उस वक्त तक अमरीकी रणनीतियोसे खुश नही होगा जबतक उसे अपने दीर्घकालीन फयडेका विश्वास नही होता. पाकिस्तान की कमज़ोर प्रजातांत्रिक व्यवस्था, भ्रष्ट राजनेता और निर्णायक क्षमता रखनेवाली सेना अमरीकी लक्ष्यओकेलिए एक सिरदर्द बन गयी है. और पाकिस्तानी राजनेता इससे बिना चिंतित हुए इस नज़ूक वक्त का फयडा उठना चाहते है. दूसरे और उसके भारत के प्रति अविश्वास के चलते पाकिस्तान चाहता है के अमरीका हमेशा दक्षिण आशिया मे बँधा रहे और पाकिस्तान को साहययता करता रहे जिससेके उसे भारत विरोध मे समर्थन मिले. लेकिन पिछले कुछ सालोमे भारत अमरीका संबंधो मे आए सुधार के कारण और अमरीकी अर्थव्यवस्थमे आए कमज़ोरिके कारण उसे अनियंत्रित अमरीकी सहायता मिलना मुश्किल हो गया है. तो पाकिस्तान का आफ्गानिस्तान के स्थिरता विषयी विचार संदिग्ध है जिसके चलते पाकिस्तानी सेना समर्थित पाकिस्तानी आतंकी गूठ अफघान तालिबान को समर्थन करते आए है और करेंगे. तो दूसरी तरफ आफ्गानिस्तान मे भी पिछले साल हुए चुनाओमे प्रजातांत्रिक प्रक्रिया मज़बूत हो कर प्रत्याशी उम्मीदवारोके ज़गड़ोके चलते कमज़ोर हो गयी थी. आनेवाले समयमे इसका यह परिणाम हो सकता है के लोगोमे प्रजातंत्र के प्रति विश्वास कम होने से तालिबान उसका फ़ायदा उठा सकता है. इसका अंतिम परिणाम यह ही होगा के प्रजातांत्रिक शक्तिया एवं प्रक्रिया विफल होनेका डर हमेशा रहेगा.

अच्छे और बुरे तालिबान मे क्या अंतर है?

आज अफ़ग़ानिस्तान मे कई सारे ऐसे गूत है जिनका तालिबान से कोई रिश्ता नही है लेकिन विकास के मौको का अभाव और एक दूसरेके प्रती सदियोसे चलता रहा अविश्वास के चलते उनकी राजनीति और अंतर-सामुदायिक व्यवहार बंदूक के सहारे चलती आरी है जिसका फ़ायदा आतंकवादी इस्लामिक शक्तियोको मिलता रहा है. अमरीका अच्छे और बुरे तालिबान मे अंतर करके तालिबान को कमज़ोर करना चाहता है और अच्छे तालिबान को देशकी मुख्यधारा मे समाविष्ट करना चाहता है.

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अपेक्षा?

अंतरराष्ट्रीय समुदाय अमरीकी प्रयासो को उस वक्त तक समर्थन देगा जबतक की आफ्गॅन युद्ध के परिणाम अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पे और विपरीत स्वरूप मे ना दिखे. मतलब कम से कम जाने गवाना और खड़ी देशॉसे चलने वाले तेल व्यापार पर परिणाम ना होना एस है. सारे पश्चिमी देश अमरीका से निकट आर्थिक और राजनैतिक संबंध रखते है. जितना डोर तक आफ्गॅन युद्ध चलेगा उतना ही नकारात्मक असर उनके पश्चिम एशिया के देशोसे सम्बंध पे होगा.

रूस ये चाहता है की अफ़ग़ानिस्तान से चलने वाले नशीले पदार्थ जो रूस जाकर उसके समाज और अर्थव्यवस्थाको कमज़ोर कर रहा है वो रोके. अफघानिस्तान की अर्थव्यवस्था मजबूत होने से  मध्य आशियाई देशोको भी व्यापार का फायदा होगा.

चीन चाहता है की अफघान तालिबान और उसके क्षिनजियांग प्रांत मे बढ़ रहे इस्लामी आतंकवाद के संबंध समाप्त करने मे अमरीका उसकी मदत करे. इसलिये चीन आफ्गानिस्तान मे आर्थिक निवेश करके तालिबानी शक्तिओके साथ मैत्रीपूर्ण संबंध जोड़ना चाहता है. यहा बात भारत के लिए चिंतापूर्ण हो सकती है क्योंकी अफ़ग़ानिस्तान मे भारत के निवेश और सुरक्षा संबंधी रूचि और ज़रूरते है. भारत को इस बात पे ध्यान देना होगा के ये दोस्ती भारतीय निवेशोकेलिए चिंता का विषय ना बने.

भारत ये भी नही चाहता है की दक्षिण आशियाई उपखण्ड मे हमेश अमरीका जैसी शक्ति की सेनाए मौजूद हो. इससे अमरीका और चीन के संघर्षो के लिए उपखण्डका उपयोग हो सकता है और दोनो तरफसे भारतिया सुरक्षको धोका उत्पन्न हो सकता है.

अफ़ग़ानिस्तान मे सबसे पहिली चुनौती ये है की आने वाले सारे फ़ैसले सही होने चाहिए क्योंकि ग़लती के लिए एवं उसे सुधारनेके लिए वक्त नही है. अन्यथा एक और गहन समय इस युद्ध पीड़ित देश के नसीब मे आएगा.
(लेखक अविनाश गोडबोले दिल्लीस्थित ईदसा मे विदेश नीति संबंधी संशोधक है)

Comments

Popular posts from this blog

Singapore Summit and China’s Strategic Assumptions in East Asia

Thus it appears as if after pulling out a credible Iran deal, one which has enough checks and balances as well as involvement of other like-minded countries, The US President   Donald Trump gave away a lot in Singapore in return little verifiable in return from Kim. It appears as if North Korea, a de-facto nuclear power, is the bigger winner out of the Singapore summit. Donald Trump did have his moment of unilateral glory in Singapore but if Japan and South Korea came out on top, then they would have more reasons to worry. Moreover, China’s headaches would rise were they to act on those worries. Until the Singapore summit, Donald Trump and Kim Jong un had fairly same reasons for direct talks. For Trump it was his desire to stamp the American supremacy. He sought to show China its place, after years of engagement policy by Obama by first completely discrediting the Six Party talks which were not only China-initiated but also China-led. He used social media on one...

पंतप्रधान मोदींचा चीन दौरा, कारणे आणि निष्कर्ष

पंतप्रधान नरेंद्र मोदी यांनी १४ ते १६ मे असे तीन दिवस चीनचा दौरा केला. ह्या दौऱ्यात अनेक असे महत्वपूर्ण करार झाले ज्यामुळे भारत आणि चीन मधील आर्थिक संबंध मजबूत होतील.  मोदींच्या दौऱ्यात भारत आणि चीनने एकूण २४ सामंजस्य कार्रंवार स्वाक्षऱ्या केल्या ज्याचे एकूण आर्थिक मूल्य २२०० करोड़ इतकी आहे. एकूणच चीन पुढच्या काही वर्षात इतकी गुंतवणूक भारतात करेल. गेल्या एक वर्षात मोदी सरकारने एक सकारात्मक आणि क्रियाशील विदेशनीती अवलंबिली असून चीन, मंगोलिया आणि दक्षिण कोरियाचा दौरा ह्या नव्या विदेश नितिची उदाहरणे आहेत. ह्या अधि मोदिंनी  नेपाल, भूटान, जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, कॅनडा, श्रीलंका, मॉरिशस इत्यादि देशांना भेट दिली होती.   चीन हा भारतचा सर्वात शक्तिशाली शेजारी देश आहे आणि एक वैश्विक महासत्ता आहे . पण भारत चीन सम्बन्ध १९६२ च्या युद्धच्या सावलीतून अजूनही बाहेर आलेले नहित. तसेच सिमा रेशा वाद आणि अक्साई चीन आणि मैकमोहन लाइन विषयीचा वाद अजूनही पूर्णतः सुटलेला नही. तसेच दोन्ही देश सामरिक दृष्टया शक्तिशाली आहेत. त्यामुळे एकूणच सम्बन्ध गुंतागुं...

Modi in Mongolia: Talking Points

Narendra Modi's visit to Mongolia was the first by an Indian PM.  Here are my talking points on that visit from a meeting-presentation. India was the first country to recognise Mongolia apart from the Soviet Bloc Mongolia was the cosponsor of the UN resolution in 1972, along with Bhutan and India, that recognised Bangladesh. India’s first Ambassador in Mongolia was Sonam Norboo, hailing from Ladak ------------------------------------ Mongolia is also seeking to expand its foreign relations with countries other than China and Russia under the policy of “Third Neighbour”. During most of the 20th century, Mongolia, due to its close links to Moscow, was said to be a country in Eastern Europe, not East Asia, where it is geographically positioned. 90 percent of Mongolian exports, most of it minerals, copper, gold, uranium and coal, go to China. China has always pressurized Mongolia for its relations with the dalai Lama, during his last visit in 2011, China lodged strong pro...